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शिक्षा का अर्थ है- बालक के तन, मन व आत्मा का सर्वांगीण व सर्वोत्कृष्ट विकास है। मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। शिक्षा मानव को एक अच्छा इन्सान बनाती है। इसलिए शिक्षा व मानव का तो पुरातन काल से ही गहरा संबंध हंै।  

 

विद्या के लिए हमारे महापुरुष कहते है-

   

‘‘न चोरहार्यम् न च राजहार्यम् न भातृभाज्यम् न च भारकारि।

     व्यये कृते वृद्धति एवं नित्यम् विद्याधनं सर्वधन प्रधानम्।।’’    

                                                 (संस्कृत सुभाषितानी)

 

        विद्यारूपी धन ऐसा धन है, जिसको कोई चुरा नहीं सकता, राजा ले नहीं सकता, भाइयों में इसका बँटवारा नहीं होता, इसका भार नहीं लगता और नित्य खर्च करने पर बढ़ता है। सचमुच विद्यारूपी धन सर्वश्रेष्ठ है। यह मानव का सबसे बड़ा आभूषण है। विद्यावान व्यक्ति कहीं पर भी चला जाएं, वो सर्वत्र सम्मान ही पाता है और जो मनुष्य विद्याविहीन है, उसके लिए शास्त्र कहते हैं,  ‘‘विद्याविहीनः पशुः’’ (संस्कृत की प्रचलित कहावत) जो मनुष्य विद्याविहीन है, वो पशु के समान है। शिक्षा द्वारा प्राप्त एवं विकसित की गयी बुद्धि ही मानव की वास्तविक शक्ति होती है। शिक्षा माता के समान रक्षा करती है, पिता के समान हितकारी कार्यांे में नियोजित करती है, पत्नि के समान दुःखों को दूर कर आनन्द पहुँचाती है, मानव के यश एवं वैभव का विस्तार करती है। हमारे वेद कहते हंै कि मानव की वास्तविक शिक्षा वह है जो मुक्ति प्रदान करे। 

               

                ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’      (यजुर्वेद 40/14)

                      नास्ति विद्यासमम् चक्षु चास्ति सत्यसमम् तपः                   

                                               (संस्कृत सुभाषितानी)

    

    महाभारत में वर्णित है कि - ‘‘विद्या के समान नेत्र तथा सत्य के समान तप कोई दूसरा नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य मात्र पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना ही नहीं है, अपितु स्वास्थ्य का भी विकास करना है। स्वास्थ्य के साथ -साथ शिक्षा। विद्या का उद्देश्य मनुष्य को पात्र बनाना है और पात्रता विनम्रता से आती है और विनम्रता की प्राप्ति विद्या से ही होती है। 

                

‘‘विद्या ददाति विनयम्, विनयाद् याति पात्रताम’’         

                                                (संस्कृत सुभाषितानि)

 

        इस प्रकार प्राचीन समय में भारतीयों की दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक उत्थान का सर्वप्रमुख माध्यम रहा और वास्तविकता में प्राचीन शिक्षा प्रणाली के कई अन्य प्रमुख उद्देश्य थे।

        

        देश का विकास व उन्नति तब ही संभव है, जब देश की शिक्षा व्यवस्था सही हो। प्राचीन काल में हमारे देश में शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था।  हमारे भारत में गुरुकुल परम्परा सबसे पुरानी व्यवस्था है, गुरुकुल वैदिक युग से ही अस्तित्व में है। उस समय में गुरुकुल पद्धति से ही शिक्षा दी जाती थी और भारत को विश्वगुरु इस पद्धति के कारण ही तो कहा जाता था। 

        प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में प्रमुखता थी ‘‘गुरुकुल पद्धति’’।  उस समय विद्यार्थियांें को अपने घर से दूर गुरुकुल में निवास कर शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती थी। गुरु जी के समीप रहते हुए विद्यार्थी उस परिवार का सदस्य हो जाता था और गुरुजी भी उसके साथ पुत्रवत् व्यवहार करते थे। बालक गुरुकुल में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करता था। वहाँ गुरुजी से पूर्व उठना, गुरुजी के सोने के पश्चात् सोना, गुरुजी की सेवा करना, उनके आदेशों का पालन करना उसका परम कर्तव्य होता था। उसकी सेवाओं के बदले गुरु भी विद्यार्थियों की शिक्षा व व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान रखते थे। गुरुकुल का निर्माण अधिकतर गाँवों से, बस्ती से, ध्वनि-शोर-शराबे से दूर वन, उपवन तथा प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण स्थान पर बनाये जाते थे, जिससे विद्यार्थी शुद्ध तथा सात्विक स्थान, प्रकृति की गोद में निवास करते हुए मानसिक रुप से तथा शारीरिक रूप से शुद्ध व स्वस्थ रहते हुए विद्या अध्ययन कर सके। आधुनिक वर्तमान समय में विद्यालय शहरों में व बस्ती में आबादी के मध्य बना दिये जाते हैं, जिससे बच्चों की शारीरिक स्वस्थता तथा मानसिक शान्ति पर गहन असर पड़ता है। विद्यार्थियों के विद्या अध्ययन हेतू बनाए गुरुकुल व विद्यालय के लिए स्थान बहुत महत्वपूर्ण है । गुरुकुल सुन्दरता व सात्विकता से परिपूर्ण, प्राकृतिक, हरियाली, शान्तिपूर्ण वातावरण तथा आबादी से दूर ही स्थित होने चाहिए।                   

इसके साथ ही साथ गुरुकुल में गुरु व शिष्य के सम्बन्ध भी बहुत गहन होते थे। शिष्य पूर्ण रुप से गुरु के प्रति समर्पित होकर गुरु सेवा में रत रहते थे और गुरु भी अपने शिष्य के सर्वांगीण विकास का हर प्रकार से ध्यान रखते थे। 

        प्राचीन व्यवस्थाकारों ने गुरु व शिष्य के सामिप्य को समझा था, इसलिए बालक को परिवार से दूर गुरुकुल में पढ़ने भेजा जाता था। गुरुजी के चरित्र व आचरण का शिष्य के मस्तिष्क पर असर पड़ता था तथा वह उस आचरण का अनुसरण करता था। परिवार से दूर रहने के कारण आत्म-निर्भरता की भावना विकसित होती थी। समाज की गतिविधियों से अवगत होने से उनमें अनुशासन की प्रवृति का भी उदय होता था

‘‘वास्तव में क्यों  है गुरूकुल की आवश्यकता’’

        

        1835 में लार्ड मैकोले ने भारत का दौरा किया और कहा- मैं पूरा भारत घूमा, वहाँ पर न ही कोई भिखारी और न ही कोई चोर मिला, मुझे किसी तरह से धन की कमी नहीं दिखाई दी। वहाँ लोगों के नैतिक मूल्य बहुत ऊँचे हैं, लोग बहुत ही होशियार हैं।  हम उन्हें जीत नहीं सकते, जब तक कि हम उनकी रीढ़ उनकी शिक्षा प्रणाली को तोड़ ना दें।  उनकी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत को खत्म न कर दें तब तक भारत को जीतना मुश्किल ही नहीं असम्भव है और यही उन्होंने किया जो तब से अब तक जारी है। 

        आधुनिक शिक्षा प्रणाली को देखें तो किताबों में जो पाठयक्रम है, वो संस्कृति विरोधी है। बच्चों को भटकाने वाला, शहीदों का अपमान करने वाला, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाला, सांस्कृतिक धरोहर व विरासत का अपमान करने वाला और कुल मिलाकर देश भक्ति की तथा माता पिता के प्रति सम्मान की भावना पैदा करने वाला नहीं है।

        इसलिए जब तक विद्यार्थी को हम गुरुकुल माहौल नहीं देंगें तब तक ये सम्भव ही नहीं है कि वह हमारे राष्ट्र की गौरवशाली संस्कृति व संस्कारों से परिचित हो सके।

        इसलिये हमारे परम पूज्य गुरुदेव भगवान के सानिध्य में निर्मित ग्राम ताणा आकोला, चित्तौडगढ में ‘‘जय गौमाता गुरुकुलम’’ का प्रयास है कि आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ हमारी प्राचीन गौ आधारित गुरुकुलीय शिक्षा विद्यार्थियों को देना, जिससे विद्यार्थी गुरुकुल से शिक्षित होकर चाणक्य और आर्यभट्ट जैसे महान विद्वान बनकर भारत को पुनः विश्वगुरु के पद पर आसीन कर सके व अपने माता -पिता और परिवार की सेवा तन-मन- धन से करें।

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